“काश कोई”

वो प्यार ही क्या जो प्यार को किसी का बंधक बना दें, उस चाहत में है यकीं हमारा जो मुझको और तुझको, काश कोई मुक्त होकर जीना सीखा दे।

रफ्तार जिंदगी की इतनी बढ़ गई है ऐ मेरे दोस्त, लगता है वक्त के साथ हर वक्त बदलता है इंसान,
काश कोई मुझको भी रिश्तों को किश्तों में जीना सीखा दे।

हर चाह दूर हो रही मुझसे, कभी-कभी ये लगता है,
अपने ही परायों की भूमिका अदा करते है,बुरे चेहरे पे अच्छा चेहरा कैसे लगा के जीते है सब, काश कोई इस हुनर से मुझको भी जीना सीखा दे।

हालात कभी तो तर्जुबों को भी मात देने लगते है,
ऐसा लगता है हाथों से खुशी फिसल जाती है दोस्त,
सदियों से खड़ी हूँ उन्ही पुरानी राहों पर, काश कोई उँगली पकड़ कर मुझको भी चलना सीखा दे।

करती हूँ इंतजार हर सुबह उस इंद्रधनुषी सपने का,
जो सुबह-अंधेरे देखते ही पूरे हो जाते थे, ये सुना था अब तक, काश कोई
मुझको भी झूठे सपनों में जिंदगी बिता देना सीखा दे।

कसौटियाँ देती आई हूँ हर पल, हर घड़ी, जज्बातों को कभी रोका कभी कुर्बान किया है, चीखती है मेरी भावनाएँ और कहती है, काश कोई सूली कैसे चढ़ा जाये वो मुझको भी सूली चढ़ना सीखा दे।

जोर नही चला पाती हूँ अपनी ही ख्वहिशों पर ,कदम-दर-कदम बस निशां देखती हूँ अपने,
सोचती हूँ, काश कोई मुझको भी इन बेरहम हालातों से डटकर लड़ना सीखा दे।

# सरितासृजना

“आग”

लगी है “आग” शहर में मेरे 

उसको किसकर बुझाऊँ मैं

चलों ऐ मेरे सपनों तुम्हें

किसी और शहर में ले जाऊँ मैं।

चेहरों पर नकाब ओढ़ा है सबने

किस-किस की पहचान कराऊँ मैं

बुजदिली को अपनी “जिहाद” नाम धराते है

उनकी बँदूक की नालियों को कैसे किसी ओर घुमाऊँ मैं।

उन्हें क्या पता कहाँ है जन्नत बसी हुई

ऐ जालिम आ ,जिस पिता को मारा, जिस माँ को मारा

उस अनाथ हुए बच्चे की आँखों से टपकते आँसू में,

बसे तेरे खुदा को तुझसे मिलवाऊँ मैं।

अरे नासमझ, हर खुशी में इक नूरं औ एक खुदा है बसता

आ तुझको, हर एक मुस्कान में बसी तेरी जन्नत से मिलवाऊँ मैं।

करता जा गिनती, कितने दामन भिगोये है तूने

हर एक आह की आजा तुझको, आज सजा दिलवाऊँ मैं।

#सरितासृजना

“अल्हड़ हूँ मैं”

अल्हड़ हूँ मैं , मुझको अल्हड़ ही रहने दो
क्युँ चाहते हो ऐ दुनियावालों ,कि मैं तुम सी समझदार बनूँ।

गर मैं नासमझ हूँ तो क्या हुआ
क्या हुआ अगर मैं तंगहाल सही
क्या हुआ अगर मुझको इस तंगदिल
दुनिया से कोई सरोकार नही,अल्हड़ हूँ मैं मुझको……

अच्छा ही तो है कि ना सीखूँ मैं बेईमानी
अच्छा ही तो है कि ना करुँ मैं धोखेबाजी
और सबसे अच्छा है कि ना दुखाऊँ मैं
दिल किसी गरीब और लाचार का,अल्हड़ हूँ मैं मुझको…..

समझदार और बडे ओहदेदारों की क्या कमी है
इस जहाँ में,चलाते है सारे सिस्टम को जो अपनी
उँगलियों पर,नचाते है समाज को हर घड़ी इशारों पर,
अल्हड़ हूँ मैं मुझको…….

जमाने तेरी हर फितरत से वाकिफ हूँ मैं
मगर मेरे अंदर छुपी इंसानियत से नावाकिफ है तू
एक यही दौलत है मेरे पास सिर्फ इक मेरी
किसी भी शर्त पर मैं, यह तुझपे लुटाने को तैयार नही । अल्हड़ हूँ मैं मुझको…….

#सरितासृजना

चंद टुकडे

1) ना रोको शब्दों को आज
इन्हें कागज पर बह जाने दो।
दर्द को दर्द से लिपटकर ऐ मेरे दोस्त
आज , खूब रो जाने दो।

2) आग सिर्फ जिस्मों को राख करती है
रूहें कहाँ जला करती है
खुद से कर वफा ऐ बंदे
कभी ठोकर तू ना खायेगा।

3) सपनों में बसे हो जिनके
जब चाहे पहुँच जाते हो करीब
उनको है शर्म हमारे करीब आने में
मगर हिचकियों पर तो कोई बंदिश नही है
ऐ मेरी जानिब ,जब जी चाहे हमको सताने में।

#सरितासृजना

“ईद”

ईद होगी मुक्कमिल उस घड़ी ,उस सहर ऐ मेरी जानिब,

जिस घड़ी इक तरफ चाँद,इक तरफ मेरे यार का दीदार 

मुक्कमल हो जाय।

ईदी में क्या चाहिए ये पूछना ना हमको ऐ मेरी जानिब,

कहीं मेरी चाहत ,तुमको तुमसे ही उम्रभर को ना माँग ली जाय।

#सरितासृजना

“अपराधबोध”

“अपराधबोध” जैसी स्थिती हमारे जीवन में कभी ना कभी उत्पन्न हो ही जाती है ।कभी हालात, कभी मनुष्य,या कभी कोई पशु या पक्षी को लेकर। आज मेरे मन में भी एक अपराध का भाव जन्मा है।अपने पालतू मादा पोपट को लेकर।कलम ने कहा “आओ ,अपने मन की पीड़ा को शब्दों का रुप दे दो”,”थोड़ा सा “अपराधबोध” शायद कम हो जाय”।उसी संदर्भ में कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ।

वो जब चुपचाप सी आसमान को तकती है। मेरे दिल में एक अपराध की कसक सी उठती है।क्या गुनाह है उसका? बस इतना सा कि वो,इंसानों की नकल करती है।

छटपटाती है वो, उडना चाहती है वो,मगर लोहे के पिंजरें में उसकी सारी मेहनत विफल हो जाती है।

थककर,अपने आप से कहती है वो शायद, चल कल फिर कोशिश करुँगी हो सकता है आजाद हो जाऊँ ।यही रोज वो खुद को समझाती जाती है।

मैं रोज देखती हूँ यह सब, तब एक “अपराधबोध” उभर आता है मन में, मैं एक कठोर मनुष्य हूँ।यह कहकर मेरा अंर्तमन मेरे वजूद को थप्पड़ लगा जाता है।

जानती हूँ ,समझती हूँ फिर भी अपने मन बहलाव के लिए,इंसानों की तरह इंसान बनकर मैं भी चुप रह जाती हूँ ।उसकी आँखों के सवालों से मैं घबराती हूँ।खुद को निर्दोष मन बतलाता जाता है।

मुझको माफ करना ऐ मासूम से परिदें,तुझको कैद करने और प्यार करने की रीत तो सदियों से चली आई है।मैने तो तुझको कैद करकर,इस जमाने की रस्म को बड़ी ही दरियादिली से निभाई है।

#सरितासृजना

“खानाबदोश”

कोई बात नही खुशी ना सही
गम को ही हम तो दामन में समेट लिया करते है
आसमां गर ना दे पनाह हमको
हम तो है “खानाबदोश” किसी के भी दिल में गुजर कर लिया करते है।
हवाओं में खुशबू बनकर हम तो ऐ जानिब
उनकी साँसों में जिदगीं अपनी हम तो बसर कर लिया करते है।

र्दद को राहत कभी मिलती नही इसका है यकीं
जहर को भी दवा समझ हम तो पी लिया करते है
धडकता है सीने में दिल हमारे कुछ इस तरह से
बस तेरे नाम से घड़ी-दर-घड़ी हम तो जी लिया करते है।
लोगों को है गुरुर अपनी रियासतों और रुतबों का
हमारा क्या यारों,
हम तो अपने फाकों पर भी फक्र कर लिया करते है।

#सरितासृजना

विचार (thought)

1) बहुत जरुरी है जीवन में अच्छे दोस्तों का होना और बहुत जरुरी है जीवन में अच्छे दुश्मनों का होना भी।

2)आकाँक्षाए ,इच्छाएँ दूसरों से ना रखें । वो जब पूरी नही होती तब,हम उदास और निराश हो जाते है।

3) रुप और सौर्दंय एक समय के बाद ढल जाते है। हमें अपने कर्म को निखारने में ज्यादा मेहनत करनी चाहिए।कर्म समय के साथ ढलता नही और निखरता जाता है।

#सरितासृजना

“ऐ जिंदगी”

ऐ जिंदगी क्या बताऊँ तुझे,
कदम-कदम पर,
हर नगर , हर डगर पर,
कितनी सहमी और सिहरी हूँ मै।

बिखरने की किसकी मैं तुझको मिसाल दूँ,

मोती भी क्या बिखरे होगें ऐ जिंदगी,

जितना हर कदम बिखरी हूँ मैं।

#सरितासृजना