“हाले-बयां”

खुदी पर इतना भरोसा खुदा से कुछ माँगती नही मैं
लोग इसको ग़रुर समझे तो मेरी ख़ता क्या है।

कर लेती हूँ हर एक दर्दों-गम से सौदा
रही तनहा सदा ,अब इससे बड़ी मेरी सज़ा  क्या है।

अपनों के होते हाल लावारिशों सा दिखाई पड़ता
अलग हो अंदाज ज़िदगीं का ,वर्ना ज़ीने का मज़ा क्या है।

ज़िदगीं के हिसाब-किताब की लोगों को है शिकायत
कुछ मिल गया, कुछ रह गया गर तो इसमें बुरा क्या है।

फ़क्र करती हूँ अपनी इसी किस्मत पर मैं बार-बार
ऱश्क करता है ज़माना तो इसमें मेरा गुनाह क्या है।

पहेली हूँ अगर मैं कोई तुम्हें ये लगता है “सरिता”
ढुढ़ँ लो मुझको सवालों मेँ की आखिर में मेरा जवाब क्या है।
#सरितासृजना

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“क्यों ना थोड़ा-सा हँस लें !”

रोते हुए पैदा होता है हर इंसा
रोते हुए निकल जाती है सारी ज़िन्दगानी,
तो क्या हुआ यारो,
आओं,आज थोड़ा-सा हँस लेते है।

बचपन गुज़रता रोते हुए दुध-खिलौनों के लिए,
उलझ जाती जवानी पढ़ाई-लिखाई के चक्रव्यूह में
तो क्या हुआ…..

प्रौढ़ होते-होते न जाने कितनी लालसाएँ,आशाएँ पूरी होती, कितनी ही अधूरी रह जाती।
तो क्या हुआ…..

जीवन-चक्र चाक के समान घूमता रहता है
धर दो उसपर कच्ची मिट्टी वो आकार लेती रहती है,
कभी सुघड़, कभी बेडौल।
तो क्या हुआ….

बुढ़ापा जब है आता सिर है चकरा जाता
जेबें और हाथ वो कई बार खाली पाता,
क्या खोया, क्या पाया सब निरर्थक।
तो क्या हुआ….

जब समय हो जाता है पूरा तब है समझ में आता
बेबस मनुष्य हालात के आगे हमेशा ही शीश नवाता।
तो क्या हुआ….

और अंत में

जो जलकर राख ही हो जाना है,
पानी में ही समाना है, इस जीवन को तो सुबह की तरह शुरु होकर ,शाम की तरह ढल जाना है।
तो क्यों ना यारो,
आओं, आज थोड़ा-सा हँस लेते है।
#सरितासृजना

“आज ये बारिश”

1) क्यों है शोर हवाओं में,
बूँदों ने तो बवाल ही मचाया है।
बिजलियों के क्या कहने,
क्षण-क्षण आकर मुझको डराया है।

2) आज ये क्या हुआ मौसम को,
घन है छाये काले-काले।
कभी मेघ डराता मुझको,
कभी बूँदें पास बुलाती मुझको।
कभी बिजलियों से जी घबराता,
कभी छप्प-छप्प करने को मन ललचाता।
#सरितासृजना

चंद टुकड़े

1) इक आग तेरे सीने में भी है,
तपिश मैंने महसूस की है,
तुझे माचिस की क्या ज़रुरत।

2)अपनी क़ाबलियत से कभी मुलाकात नही हुई,
वर्ना हमारा नाम भी शुमार होता,
दुनिया के “क़ाबिलों” में।

3) कभी अपने दर्द के साथ आकर फुर्सत में मिल,
गर मैंने दिया तो उस दर्द की हकदार मैं भी हूँ।

3)अपने दर्द के साथ तू जी ले ऐ दोस्त,
कोई और तेरे साथ ना हुआ तो क्या हुआ।
#सरितासृजना

दर्द के छाले

मेरी खुबसूरत हँसी के पीछे छिपे,

दर्द को तू समझ ना पायेगा।

दिल को मेरे आ जाय सुकुँन ऐसी कोई,

दवा तू मुझको कभी दे ना पायेगा।

लाजमी तो नही हर तकलीफ बाँटी जाय,

आँसू के एक-एक कतरे का हिसाब रखा जाय।

क्या हुआ जो मेरी नजर,हर नजारे में उसको ढुढ़ँती है,

मेरी साँस उसको अपनी साँसों में महसूस करती है।

सीने में उठे तूफानों को कैसे मैं समझाऊँ ऐ “सरिता”,

छाले जो पड़ गये मन की हथेली पर,उसे किसे दिखाऊँ मैं।

#सरितासृृजना