“आँखे बोलती है”

आँखे बोलती है,वो अन्तस के भेद खोलती है,

कभी हल्की,कभी भारी एक बोझ समेटती हुई,

कितनी ही गहराईयों को सहेजती हुई,

आँखे बोलती है, वो अन्तस के भेद खोलती है।

जो छुपाना है अपने अंदर का तूफान

बंद कर लो इन्हें,व्यक्त ना होने पाये,

मन की पीड़ायें,भावनाएँ और अनकही लालसाएँ,

क्योंकि,

आँखे बोलती है, वो अन्तस के भेद खोलती है।

राग-द्वेष,ईष्या सब नजर आ जाते है इनमेँ,

दु:ख और खुशियों के आँसू छलक आते है इनमें,

यह मौन रहकर भी सबकुछ जता जाती हैं।

कभी करुणा के भाव, कभी दया को दर्शाती है,

चिर-परिचित सा आभास कभी,कभी अनोखापन,

सिहरन और कंपन का भी ,कभी आभास करा जाती है।

पता है !

आँखे बोलती है , वो अन्तस के भेद खोलती है।

#सरितासृजना

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“अभिमन्यु”

दर्द ने सबको सताया ,
खुशी और सुँकून की तलाश है।
ज़िदगीं की मुश्किलें चक्रव्युह के समान,
जिसे तोड़ने को एक “अभिमन्यु” की तलाश है।

#सरितासृजना

“तेरा खोना”

समुद्र की रेत पर बने थे जो निशां,

आकर लहरों ने उनको मिटा दिया।

अब कहाँ ढुढूँ तुझको मैं दर-ब-दर,

तू तो हवाओं में ना जाने कहीं गुम हो गया।

कदम हमेशा ठहर गये मँज़िलों से पहले,

वक्त ने जब-जब अपना मुखौटा बदल दिया।

राहें छूटी, छूटे दोस्त और दुश्मन,

ज़िन्दगीं ने पता नही कब ,कैसेऔर क्यूँ, अपना कारवाँ बदल दिया।

#सरितासृजना

 “चंद टुकडे”

1) सफ़र में हमसफ़र हो साथ अगर
ज़िदगी, तेरा हर ज़ख्म हमको है प्यारा।

2)ख़ुद को हर ख्वाहिश से आजाद कर,
आजा ख़ुद को खुशियों से आबाद कर।

3)चाहती हूँ तेरी ख्वाहिश बनकर जीऊँ ता ज़िदगीं,
खत्म ना हो चाहत तेरी मुझको पाकर कहीं।

4)तेरे दर्द ने तुझको ज़ालिम बना दिया,
बनना था तुझको इक फ़रिश्ता,
मगर क़िस्मत ने तुझको क़ातिल बना दिया।

5) हर बात तेरी मजूँर करुँ ये ज़रुरी तो नही,
कुछ तो मुझ में मेरा बाकी रहने दें।
#सरितासृजना

“चंद टुकड़े “

1) तुझसे मिलकर तेरे ज़ख्मों को हवा दे दी हमने,
अब तू ही बता तेरे ज़ख्मों की दवा क्या है।
2) तू एक बुत-सा है, तेरी अहमियत मुझसे है,
मैं साँसें हूँ तेरी, मैं नही तो तू भी नही।
3) तेरा तुझमें कुछ नही सब कुछ है मेरा,
तेरी साँसों पर अब भी मेरा इख्तियार है।
4) अपनी साँसों में बसा ले मुझको,
जब तलक हैं साँसें तेरी ,
तब तलक मैं भी ज़िन्दा रहूँगीं।
5) आँसूओं ने हमेशा दिलों के राज़ खोले है,
वर्नां मुस्कुराते चेहरों का ग़म कौन जान पाया है।
# सरितासृजना

“हाले-बयां”

खुदी पर इतना भरोसा खुदा से कुछ माँगती नही मैं
लोग इसको ग़रुर समझे तो मेरी ख़ता क्या है।

कर लेती हूँ हर एक दर्दों-गम से सौदा
रही तनहा सदा ,अब इससे बड़ी मेरी सज़ा  क्या है।

अपनों के होते हाल लावारिशों सा दिखाई पड़ता
अलग हो अंदाज ज़िदगीं का ,वर्ना ज़ीने का मज़ा क्या है।

ज़िदगीं के हिसाब-किताब की लोगों को है शिकायत
कुछ मिल गया, कुछ रह गया गर तो इसमें बुरा क्या है।

फ़क्र करती हूँ अपनी इसी किस्मत पर मैं बार-बार
ऱश्क करता है ज़माना तो इसमें मेरा गुनाह क्या है।

पहेली हूँ अगर मैं कोई तुम्हें ये लगता है “सरिता”
ढुढ़ँ लो मुझको सवालों मेँ की आखिर में मेरा जवाब क्या है।
#सरितासृजना

“क्यों ना थोड़ा-सा हँस लें !”

रोते हुए पैदा होता है हर इंसा
रोते हुए निकल जाती है सारी ज़िन्दगानी,
तो क्या हुआ यारो,
आओं,आज थोड़ा-सा हँस लेते है।

बचपन गुज़रता रोते हुए दुध-खिलौनों के लिए,
उलझ जाती जवानी पढ़ाई-लिखाई के चक्रव्यूह में
तो क्या हुआ…..

प्रौढ़ होते-होते न जाने कितनी लालसाएँ,आशाएँ पूरी होती, कितनी ही अधूरी रह जाती।
तो क्या हुआ…..

जीवन-चक्र चाक के समान घूमता रहता है
धर दो उसपर कच्ची मिट्टी वो आकार लेती रहती है,
कभी सुघड़, कभी बेडौल।
तो क्या हुआ….

बुढ़ापा जब है आता सिर है चकरा जाता
जेबें और हाथ वो कई बार खाली पाता,
क्या खोया, क्या पाया सब निरर्थक।
तो क्या हुआ….

जब समय हो जाता है पूरा तब है समझ में आता
बेबस मनुष्य हालात के आगे हमेशा ही शीश नवाता।
तो क्या हुआ….

और अंत में

जो जलकर राख ही हो जाना है,
पानी में ही समाना है, इस जीवन को तो सुबह की तरह शुरु होकर ,शाम की तरह ढल जाना है।
तो क्यों ना यारो,
आओं, आज थोड़ा-सा हँस लेते है।
#सरितासृजना