“बाकी”

कुछ छूट गया, कुछ मिल गया,
कुछ मिलना “बाकी” है।
देखते है ज़िदगीं अभी और कितना जीना” बाकी” है।

कुछ लिखा था, कुछ लिखा है, कुछ लिखना “बाकी” है
देखते है किस्मत में “सरिता” तेरी कितना और वक्त “बाकी” है।

कुछ सह लिया, कुछ सहा है, कुछ सहना “बाकी” है।
देखते है गलतियों से कितना और सीखना “बाकी” है।

कुछ सोचा था, कुछ सोचा है, कुछ सोचना “बाकी” है।
देखते है मुश्किलों को और कितना जीतना “बाकी” है।
#सरितासृजना

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“अज़ीब”

अज़ीब सी बात है दोस्तों,
खुशियों की उम्र हमेशा क्युँ कम होती है।
गम के दिन औ रात बड़ी लम्बी होती है,
या युँ कहे, कि हम इंसा खुशियों को कम पसंंद करते है, और दुखों को जीवन भर ढ़ोते रहते है।
हँसना हो तो बड़ी देर लगाते है हम,
रोना हो तो एक उम्र भी कम लगती है।
खुशियों को कम ही बाँटते है हम,
डर है नज़र लग जायेगी।
दुख जब-तब बाँटते फिरते है, पर आह!
मुएँ,दुख को कभी नजर लगती ही नही!
सुख की चाह हर किसी को,ऐ दिल,
गम की बातें बड़ी बुरी लगती है।
दुख की घड़ियाँ कभी-कभी ऐ “सरिता”
अहसासों में बसकर चुभने सी लगती है।
#सरितासजृना

“अभिव्यक्ति”

1) मैं पीर पराई कैसे जानूँ,
जब मैंने सौ-सौ नीर बहाये है।
पग-पग काँटे हरपल शोले,
दुनिया ने मेरे कदमों तले बिछाये है।

2)वो हाथ कभी मिला नही,
जो सशक्त सहारा दे सके।
वो शब्द कभी सुने नही,
जो मन को किनारा दे सके।

#सरितासृजना