निर्मम हत्या

केरल में जंगल के करीब कुछ गाँव वालों ने एक भूखी र्गभवती हथिनी को अनानस के अंदर पटाखे भरकर खिला दिया जिससे उसका मुँह बुरी तरह जल गया। उसने उसके बाद भी किसी को नुकसान नही पँहुचाया और वह हथिनी दर्द और भूख से तड़पती हुई जाकर नदी में खड़ी हो गई।वनविभाग ने पुरजोर कोशिश की उसे बाहर निकालने की पर वो सब नाकामयाब रहे और उस हथिनी ने तड़पते हुए अपनी जान दे दी।वनविभाग के अधिकारी बहुत दुखी हुए वो दो जानों को बचा न सके।उसकी मौत के बाद उसके शरीर को वनविभाग ने बाहर निकालकर उसका सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया।यह घटना मन को द्रवित करने वाली है। जब पुरी दुनिया कोरोना जैसी महामारी से जूझ रही है कुछ इंसान अब भी इंसानियत की हद पार कर गये और दो जानों की बलि ले ली।क्रूरता का यह ताजा उदाहरण बहुत ही शर्मनाक है।उन्हें इसकी क्या सजा मिलेगी ? कम से कम फाँसी तो नही।क्या वो अपने इस कुत्य पर शर्मिंदा होगें ? दो जानें बिना अपराध के छीन ली गई। इस” निर्मंम हत्या “के लिए कौन जिम्मेदार है? वो लोग जिन्होंने ये हत्या की या हमारा पशु अधिनियम जो बहुत कमजोर है।

“मैं मजदूर हूँ”

रोज सैंकड़ों की तादाद में मजदूर अपने घर वापस लौंट रहे हैं। देश में मजदूर करोड़ों की संख्या में हैं अब समझ आया। हमारा देश किसानों का देश कहा जाता है पर अब हमारा देश मजदूरों का देश भी है यह हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। एक बड़ा तबका या यूँ कहें एक विशाल समुदाय हैं मजदूर।वो हर जाति और धर्म का है हर एक राज्य का है।कल एक व्यक्ति को फोन पर बात करते हुए देखा वो रो रहा था।घर जाना चाह रहा था पर शायद इंतजाम नही हो पाया था।वो बाहर रो रहा था और मेरा मन अंदर।पूछा भाई तुम कौन ?जवाब आया”मै मजदूर हूँ”।

पैदल जब चला मजदूर ,तब मरा मजदूर

ट्रकों में भरकर जब चला तब भी मरा मजदूर

बसों में भी जब चढ़ा दबकर मरा मजदूर

पटरियों पर सोने की सजा मौत को भोगता मजदूर

ट्रेनों की आस में जाने कितनी बार रोया होगा मजदूर

भूख और बीमारी से बचने को भागता मजदूर

जीने की आस लिए देखो यारों रोज मरता मजदूर।

वर्तमान को छोड़ देखो यारों अतीत में लौटता मजदूर।

-सरितासृजना

आफ़त(कोरोना वायरस)

मुश्किल घड़ी है आफत बड़ी है

फिर भी मुझको यकीं है

दर्द का यह मँजर गुज़र जायेगा

ये वक्त है यारों, ये कहाँ ठहरता है

आज है, कल परसों ये भी बदल जायेगा।

-सरितासृजना