“प्यार”

उम्र गुज़र गई तुमको हमपें,हमकों तुमपें ऐतबार न हुआ,
ना जाने क्यों हमको कभी,तुमसे “प्यार”न हुआ।

नज़रों से नज़रे उलझती रही हमेशा,
लब्ज़ो से कभी मगर कोई इकरार न हुआ।

#सरितासृजना

Advertisements

“वो सब”

खींची गई जब तस्वीरें ,
पाक दामन नज़र आये थे,
“वो सब”।
बेठै थे हवस का खंजर लिए,
शराफ़त की महफ़िल में,
“वो सब”।
हाथ सने थे अस्मत के खुँ से,
ज़ेबों में हाथ रखकर लाये थे,
“वो सब”।
चेहरे पर मुस्कुराहट सजी थी,
आँखों में हैवानियत छिपाकर लाये थे,
“वो सब”।
आपको देखा तो है पर याद नही,
इल्जामों का ये असर की भुल गये,
“वो सब”।
क्या देगें सज़ा, क्या होगी सुनवाई,
अदालत उन्हीं की जहाँ पर बैठे है,
“वो सब”।
अब क्या बतायें”सरिता”हम तुम्हें,
गुनाह खुद सजा देगा कहते है,
“वो सब”।
#सरितासृजना

“निश्चल हँसी”

रास्तों में से जब रास्तें निकल आते है,
लम्बे फ़ासलें आसानी से तय हो जाते है
निराशा से जब उम्मीद की किरण निकले,
ज़िदगीं उसी क्षण सभंल जाती है।
खामोश होंठो से निकलकर कोई
अनजान खुशी ,चेहरे पर बिखर जाती है।
एकाकीपन भरने लगे जब कोई निश्चल हँसी
संम्पुर्णता का एक अहसास करा जाती है।
#सरितासृजना

चंद टुकड़े

1)थोड़ा-थोड़ा रोज तुम्हें भूलते रहे
मगर कमब्खत
उसी बहाने तुम रोज याद आते रहे।

2)”गालिब” तेरी शायरी में तेरा दर्द झलकता है
तुझसे दो-चार होने को अभी मेरा कद बहुत छोटा है।

3)झूठ का सिक्का बाजारों में खूब चलता है “सरिता” क्योंकि
सच का ज़मीर नोटों के बीच सोता है।

#सरितासृजना

“मौत”

“मौत तो कहते है एक सच्चाई है,

“मौत” को देख ज़िदगीं घबराई है।

जब यह आती है किसी को नही भाती है,

“मौत” की यह एक कड़वी सच्चाई है।

यह ना देखे नवजात का रुदन,

यह क्या जाने बूढ़ों की आँख भरभराई है।

अटल है जल्दी टलती नही ये,

लौटकर सदा वापस आई है ये।

यही है जो फर्क नही करती कभी ,

अमीर-गरीब को सदा एक सी आई है।

कलयुग हो, सतयुग हो,कोई भी युग हो,

युगों-युगों इसकी पंरपंरा चली आई है।

डरना क्या आओ “सरिता”,इसका सम्मान करें,

यही अपनी है दोस्तों, बाकी दुनिया तो पराई है।

#सरितासृजना

“कठुआ की परी”

देखो आज फिर से हवाओं में मचा कोलाहल,
मानवता को “मानवरुपी पशु” ने किया हलाहल।

किस की पीठ थपथपाऊँ, किस टीले चढ़ नारा लगाऊँ
किसको मैं धैर्य बधाऊँ, किसका लहू पी जाऊँ।

कर लूँ कैद खुद को मैं तू ही बता,
या,
किस देवी को बोल मैं तेरी बलि चढ़ाऊँ

कितने आसूँ पोछूँ, कितने दर्द को झेलूँ,
या,
आसूँओं के समंदर में तुझको डुबोऊँ।

शांत रहूँ मैं, अब भी शांत रहूँ मैं!!
या,
चीत्कारों से गगन-धरा को हिलाऊँ ।

मूक दर्शक बनी रहूँ क्या मैं “सरिता”
या,
झकझोर कर सोये मानव को जगाऊँ।
#सरितासृजना