प्लास्टिक का विकल्प

जब से प्लास्टिक बैन का ड़ड़ा चला है। इस्तेमाल करने वालों को परेशानी झेलनी पड़ रही है।अब क्या करें सब सोच रहे हैं। समस्या अपने अंदर समाधान छुपाये रहती है जरुरत होती है खोजने की और समझने की।सब मिलकर सोचेगें तो रास्ता जरुर निकलेगा।(कुल्हड़) ग्लास का विकल्प हो सकता है। हाँ पता है आसान नही है। कुछ कहेगें क्या बेवकूफी है!! पर सोचिए।थोड़ी परेशानी से अगर समस्या हल हो सकती है तो क्युँ ना ये परेशानी उठा ली जाय। इससे रोजगार भी बढ़ेगा।बाकी के सामानों का भी विकल्प भी हो सकता है जैसे चम्मच, स्ट्रा,लिक्विड चीजों के लिए पार्सल डिब्बे वगैरह।इन सब चीजों को बनाने के लिए उस चीज का उपयोग किया जा सकता है जिनसे टोकरियाँ, सूप बनते है। पत्ते के दोने भी प्लास्टिक कटोरी का विकल्प हो सकते है। उसी तरह पत्तल प्लास्टिक प्लेट की जगह इस्तेमाल कर सकते है।ग्लास की जगह कुल्हड़।चम्मच और स्ट्रा का भी विकल्प हो सकता है।टोकरी बनाने में जो चीज इस्तेमाल होती है। उसका उपयोग इन्हें बनानेवाले कारीगर अपने दिमाग का इस्तेमाल कर ढुँढ़ सकते है।इससे रोजगार बढ़ सकता है गाँव और शहर दोनों जगह। बेरोजगारों को रोजगार मिल सकता है। हो सकता है महिलाओं को काम मिल जाएँ घर बैठे। 

खुद भी सोचें दोस्तों और दुसरों को भी शेयर करें।

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“गुनाह”

करते है “गुनाह” सभी एक “गुनाह”
हमने भी किया, तो क्या बुरा किया।

ज़मी को चाह फ़लक की फ़लक
को ज़मीं पर झुकाया, तो क्या बुरा किया।

रेगिस्ताँ था दिल उनका उसको
गुलिस्ताँ बनाया, तो क्या बुरा किया।

भटक गया था वो रास्ता “सरिता”
उसे मँजिल तक पँहुचाया, तो क्या बुरा किया।

दुनियाँ ने लगाई तोहमतें हज़ार हमपर
उसे हमने कबूल किया, तो क्या बुरा किया।

इश्क़ में मिट गये कई दीवाने
हमने ख़ुद को फ़ना किया, तो क्या बुरा किया।

#सरितासृजना

“मुश्किल”

सब्र हो जाय हर चीज़ में मुमकिन तो नही,
बेसब्री दीवानगी बन जाय ये मुश्किल तो नही।
चलो करते है शामिल इस एक लफ्ज़ को,
शब्दों मेँ भाव मिल जाय ये मुश्किल तो नही।
वजूद जब नही होता किसी चीज़ का,
सैकड़ों में वो गुम हो जाय ये मुश्किल तो नही।
परवाह नही ज़माने की वो क्या कहते है “सरिता”,
बेखौफ़ उनको आईना दिखाना ये मुश्किल तो नही।
महफ़िल हो या तनहाई जो हर सूँ महसूस हो,
उस नज़र को पहचानना ये मुश्किल तो नही ।

#सरितासृजना

“सलीका”

मैं हूँ बेतरतिब मुझको जीने का सलीका सीखा दो,
बेरंग तस्वीर मेरी उसमें रंग भरने का तरीका सीखा दो।
एक अधुरा गीत गुनगुनाती हूँ रोज़ अकेले में,
महफ़िल में पेशकश की फ़रमाईश पर यारोँ,
उस ऩज्म को पेश करने का तरीका सीखा दो।
उनकी आँखों को पसंद आये मेरा सँवरना,
कुछ इसतरह के सँवरने का मुझको सलीका सीखा दो।
#सरितासृजना

“दिल”

ना सुनाओं किसी शायर का कोई शेर मुझको,
कि मेरा दिल भी शेर कहने को धड़कता है।
सुनकर किस्से-ए-बँया हाल उनका यारों,
मेरा “दिल”भी कुछ कहने को तड़पता है।
#सरितासृजना

रंग

हास्य के “रंग” मैं बिखेर नही सकती,
मुझको गम की काली चादर से इश्क है।
होगा उनको नाज़ अपनी खोखली मुस्कुराहटों पर,
मुझको अपने नमकीन अश्कों पर फ़क्र है।
#सरितासृजना