विचार(thought)

हम जिनसे प्यार करते है, कितना प्यार करते है,

ये हम तब तक नही बता सकते जब तक वो हमारे साथ है।

हमें खुद ये हकीकत उनके खो जाने के बाद पता चलती है।

कोशिश करें जिसे प्यार करते है, वो कभी ना खोये।

#सरितासृजना

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“मेरी वेदना”

असर्मथ हूँ आज मैं अपनी वेदना कह पाने में,

कैसे समझूँ मूक और मौन की भाषा,

इंसान हूँ शब्द और हाव-भाव ही पहचान पाती हूँ,

तेरी तकलीफ, तेरा दर्द और तेरा एकाकीपन ,

समय रहते जो समझ जाती, तो आज यूँ ही तुझे ना खो जाती।

महसूस हुआ है आज ये ,मनुष्य कहता है वो सब कुछ जीत सकता है, 

फिर क्यूँ ,आज मेरा आँचल तेरे स्पर्श से खाली है 

तेरी साँसों को अब न महसूस कर पाऊँगी मैं कभी।

कैसे बताऊँ दुनिया को , कैसे समझाऊँ,

आज मेरे ममत्व का एक छोटा सा हिस्सा खाली-खाली है।

लिखने का मन नही आज ऐ मेरी दोस्त (कलम) ,

सच बता ,

मेरी भावनाओं को क्या तेरे लिखे शब्द, कागज पर उकेर पायेगें ?

जिन्होंने ना सहा होगा कोई भी दर्द जीवन में,

क्या वो मेरे इस बेपनाह दर्द को समझ पायेगें।

(प्रिय दोस्तों आप सब सिर्फ इस रचना को पढ़ लीजीए बस।कोई likes नही चाहती।)

#सरितासृजना

“जय हिन्द”

कण-कण में भारत गूँज रहा,

नस-नस में हिन्द की रवानी है,

बच्चा-बच्चा “जय हिन्द” का नारा लगा रहा,

क्षण-क्षण के इस,ये धरती-गगन भी सानी है।

जय हिन्द दोस्तों!!

#सरितासृजना

“ये नयन”

जब भी ये नयन मुख की भाषा बोल जाते है ,

बिन कहे कितने ही अनगिनत बोल, वे बोल जाते है।

अधरों में कोई स्पंदन नही,कोई कंपन नही,

पर ये नयन मिश्री से मीठे बोल अक्सर, बोल जाते है।

बोली तो हर कोई बोले,शब्द छोटे हो या हो बड़े

पर ये नयन-तराजू तो, उन शब्दों को भी तौल जाते है।

अनेक है भाषाएँ देश औ दुनिया, दूर-दराज में,

पर ये नयन ,नयनों संग अपने दिलों के राज हमेशा खोल जाते है।

चाहे खुशियों के दिन हो, या दुखों की रातें,

पर ये नयन हर पल के भावों को ,अनमोल कर जाते है।

नही अछुते बड़े-बड़े भी, इनके बाणों के प्रहार से,

तभी तो , तपस्वीयों के मन भी इनपर अक्सर डौल जाते है।

#सरितासृजना

“भ्रम”

जो साथ है उसे तू भूला चला,
जो दे गया दगा उसपर है तू फ़िदा।
वाह री दुऩिया, तेरी अनोखी रीत है,
क्या कहूँ इसे ये हार है कि ये जीत है।

हर चमकती चीज़ सोना नही होती, ऐ दोस्त,
कभी-कभी ख़ुबसूरत फूलों में भी महक नही होती, ऐ दोस्त।
क़द्र उनकी करो जो साथ निभाते है ताउम्र,
उन्हें भूल जाना ही बेहतर जो पलटकर नही आते है।

कभी फ़लक तो कभी ज़मी बस एक ही तो है हासिल,
ना लगा उसको गले जो हो सकता है हो, नाकाबिल।

अभी धुँधला कोहरा है छाया हुआ दिलो-दिमाग पर,
पलटी थी नजर, बहुत दूर से आती कभी उसी आवाज पर।
पास आने पर सारे “भ्रम” हैं बिखर से गये थे, बहुत पहले ही,
तस्वीर पर उसकी इबादत के आँसू बह गये थे, बहुत पहले ही।

#सरितासृजना

“गोया”

सुगबुगाहट सी है किसी के कदमों की

आज ना जाने क्यों फिर से इन फिजाओं में

अनजाना सा चेहरा है फिर भी ना जाने क्यूँ

पहचान लग रही मुझको सदियों पुरानी सी

वक्त की चादर ने परतें कई बिछौ दी है

धूल पड चुकी किताबों से सदा आ रही है कुछ-कुछ

इक जो दास्ताँ रही थी अधूरी-अनकही कभी

क्यूँ आज ये हवा उनकी फिर से याद दिला रही है

मंसूबे तेरे अजनबी “गोया”नजर से दूर है मेरे

इरादों को महसूस क्यों नही मेरी नजर कर पा रही है

देखे फिर से क्या ये मुलाकात रंग लाती है

जिंदगी एक बार फिर से देखूँ ऐ “सरिता” कितनी मुझको दुबारा आजमाती है।

#सरितासृजना

“काश कोई”

वो प्यार ही क्या जो प्यार को किसी का बंधक बना दें, उस चाहत में है यकीं हमारा जो मुझको और तुझको, काश कोई मुक्त होकर जीना सीखा दे।

रफ्तार जिंदगी की इतनी बढ़ गई है ऐ मेरे दोस्त, लगता है वक्त के साथ हर वक्त बदलता है इंसान,
काश कोई मुझको भी रिश्तों को किश्तों में जीना सीखा दे।

हर चाह दूर हो रही मुझसे, कभी-कभी ये लगता है,
अपने ही परायों की भूमिका अदा करते है,बुरे चेहरे पे अच्छा चेहरा कैसे लगा के जीते है सब, काश कोई इस हुनर से मुझको भी जीना सीखा दे।

हालात कभी तो तर्जुबों को भी मात देने लगते है,
ऐसा लगता है हाथों से खुशी फिसल जाती है दोस्त,
सदियों से खड़ी हूँ उन्ही पुरानी राहों पर, काश कोई उँगली पकड़ कर मुझको भी चलना सीखा दे।

करती हूँ इंतजार हर सुबह उस इंद्रधनुषी सपने का,
जो सुबह-अंधेरे देखते ही पूरे हो जाते थे, ये सुना था अब तक, काश कोई
मुझको भी झूठे सपनों में जिंदगी बिता देना सीखा दे।

कसौटियाँ देती आई हूँ हर पल, हर घड़ी, जज्बातों को कभी रोका कभी कुर्बान किया है, चीखती है मेरी भावनाएँ और कहती है, काश कोई सूली कैसे चढ़ा जाये वो मुझको भी सूली चढ़ना सीखा दे।

जोर नही चला पाती हूँ अपनी ही ख्वहिशों पर ,कदम-दर-कदम बस निशां देखती हूँ अपने,
सोचती हूँ, काश कोई मुझको भी इन बेरहम हालातों से डटकर लड़ना सीखा दे।

# सरितासृजना

“आग”

लगी है “आग” शहर में मेरे 

उसको किसकर बुझाऊँ मैं

चलों ऐ मेरे सपनों तुम्हें

किसी और शहर में ले जाऊँ मैं।

चेहरों पर नकाब ओढ़ा है सबने

किस-किस की पहचान कराऊँ मैं

बुजदिली को अपनी “जिहाद” नाम धराते है

उनकी बँदूक की नालियों को कैसे किसी ओर घुमाऊँ मैं।

उन्हें क्या पता कहाँ है जन्नत बसी हुई

ऐ जालिम आ ,जिस पिता को मारा, जिस माँ को मारा

उस अनाथ हुए बच्चे की आँखों से टपकते आँसू में,

बसे तेरे खुदा को तुझसे मिलवाऊँ मैं।

अरे नासमझ, हर खुशी में इक नूरं औ एक खुदा है बसता

आ तुझको, हर एक मुस्कान में बसी तेरी जन्नत से मिलवाऊँ मैं।

करता जा गिनती, कितने दामन भिगोये है तूने

हर एक आह की आजा तुझको, आज सजा दिलवाऊँ मैं।

#सरितासृजना

“अल्हड़ हूँ मैं”

अल्हड़ हूँ मैं , मुझको अल्हड़ ही रहने दो
क्युँ चाहते हो ऐ दुनियावालों ,कि मैं तुम सी समझदार बनूँ।

गर मैं नासमझ हूँ तो क्या हुआ
क्या हुआ अगर मैं तंगहाल सही
क्या हुआ अगर मुझको इस तंगदिल
दुनिया से कोई सरोकार नही,अल्हड़ हूँ मैं मुझको……

अच्छा ही तो है कि ना सीखूँ मैं बेईमानी
अच्छा ही तो है कि ना करुँ मैं धोखेबाजी
और सबसे अच्छा है कि ना दुखाऊँ मैं
दिल किसी गरीब और लाचार का,अल्हड़ हूँ मैं मुझको…..

समझदार और बडे ओहदेदारों की क्या कमी है
इस जहाँ में,चलाते है सारे सिस्टम को जो अपनी
उँगलियों पर,नचाते है समाज को हर घड़ी इशारों पर,
अल्हड़ हूँ मैं मुझको…….

जमाने तेरी हर फितरत से वाकिफ हूँ मैं
मगर मेरे अंदर छुपी इंसानियत से नावाकिफ है तू
एक यही दौलत है मेरे पास सिर्फ इक मेरी
किसी भी शर्त पर मैं, यह तुझपे लुटाने को तैयार नही । अल्हड़ हूँ मैं मुझको…….

#सरितासृजना

चंद टुकडे

1) ना रोको शब्दों को आज
इन्हें कागज पर बह जाने दो।
दर्द को दर्द से लिपटकर ऐ मेरे दोस्त
आज , खूब रो जाने दो।

2) आग सिर्फ जिस्मों को राख करती है
रूहें कहाँ जला करती है
खुद से कर वफा ऐ बंदे
कभी ठोकर तू ना खायेगा।

3) सपनों में बसे हो जिनके
जब चाहे पहुँच जाते हो करीब
उनको है शर्म हमारे करीब आने में
मगर हिचकियों पर तो कोई बंदिश नही है
ऐ मेरी जानिब ,जब जी चाहे हमको सताने में।

#सरितासृजना