खुदी पर इतना भरोसा खुदा से कुछ माँगती नही मैं
लोग इसको ग़रुर समझे तो मेरी ख़ता क्या है।

कर लेती हूँ हर एक दर्दों-गम से सौदा
रही तनहा सदा ,अब इससे बड़ी मेरी सज़ा  क्या है।

अपनों के होते हाल लावारिशों सा दिखाई पड़ता
अलग हो अंदाज ज़िदगीं का ,वर्ना ज़ीने का मज़ा क्या है।

ज़िदगीं के हिसाब-किताब की लोगों को है शिकायत
कुछ मिल गया, कुछ रह गया गर तो इसमें बुरा क्या है।

फ़क्र करती हूँ अपनी इसी किस्मत पर मैं बार-बार
ऱश्क करता है ज़माना तो इसमें मेरा गुनाह क्या है।

पहेली हूँ अगर मैं कोई तुम्हें ये लगता है “सरिता”
ढुढ़ँ लो मुझको सवालों मेँ की आखिर में मेरा जवाब क्या है।
#सरितासृजना

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