लगी है “आग” शहर में मेरे 

उसको किसकर बुझाऊँ मैं

चलों ऐ मेरे सपनों तुम्हें

किसी और शहर में ले जाऊँ मैं।

चेहरों पर नकाब ओढ़ा है सबने

किस-किस की पहचान कराऊँ मैं

बुजदिली को अपनी “जिहाद” नाम धराते है

उनकी बँदूक की नालियों को कैसे किसी ओर घुमाऊँ मैं।

उन्हें क्या पता कहाँ है जन्नत बसी हुई

ऐ जालिम आ ,जिस पिता को मारा, जिस माँ को मारा

उस अनाथ हुए बच्चे की आँखों से टपकते आँसू में,

बसे तेरे खुदा को तुझसे मिलवाऊँ मैं।

अरे नासमझ, हर खुशी में इक नूरं औ एक खुदा है बसता

आ तुझको, हर एक मुस्कान में बसी तेरी जन्नत से मिलवाऊँ मैं।

करता जा गिनती, कितने दामन भिगोये है तूने

हर एक आह की आजा तुझको, आज सजा दिलवाऊँ मैं।

#सरितासृजना

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