“अपराधबोध” जैसी स्थिती हमारे जीवन में कभी ना कभी उत्पन्न हो ही जाती है ।कभी हालात, कभी मनुष्य,या कभी कोई पशु या पक्षी को लेकर। आज मेरे मन में भी एक अपराध का भाव जन्मा है।अपने पालतू मादा पोपट को लेकर।कलम ने कहा “आओ ,अपने मन की पीड़ा को शब्दों का रुप दे दो”,”थोड़ा सा “अपराधबोध” शायद कम हो जाय”।उसी संदर्भ में कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ।

वो जब चुपचाप सी आसमान को तकती है। मेरे दिल में एक अपराध की कसक सी उठती है।क्या गुनाह है उसका? बस इतना सा कि वो,इंसानों की नकल करती है।

छटपटाती है वो, उडना चाहती है वो,मगर लोहे के पिंजरें में उसकी सारी मेहनत विफल हो जाती है।

थककर,अपने आप से कहती है वो शायद, चल कल फिर कोशिश करुँगी हो सकता है आजाद हो जाऊँ ।यही रोज वो खुद को समझाती जाती है।

मैं रोज देखती हूँ यह सब, तब एक “अपराधबोध” उभर आता है मन में, मैं एक कठोर मनुष्य हूँ।यह कहकर मेरा अंर्तमन मेरे वजूद को थप्पड़ लगा जाता है।

जानती हूँ ,समझती हूँ फिर भी अपने मन बहलाव के लिए,इंसानों की तरह इंसान बनकर मैं भी चुप रह जाती हूँ ।उसकी आँखों के सवालों से मैं घबराती हूँ।खुद को निर्दोष मन बतलाता जाता है।

मुझको माफ करना ऐ मासूम से परिदें,तुझको कैद करने और प्यार करने की रीत तो सदियों से चली आई है।मैने तो तुझको कैद करकर,इस जमाने की रस्म को बड़ी ही दरियादिली से निभाई है।

#सरितासृजना

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