देखो कितनी सुंदर पुरवाई है
लगता है गलती से मेरे घर चली आई है
आई होगी पडोस के घर
दरवाजे एक से है ना हमारे।

आई है तो आजा बैठ पास हमारे
बातें कर लेँ दोचार प्यारी-प्यारी
बाँट लूँ तुझ संग मैं अपने गम सारे
बहुत समय हुआ ,
अच्छा समय बिताएँ।

तू बंधनोँ से परे आजाद फिरा करती है
और मेरी रुह तो इस जिस्म की जेल मेँ
हर लमहा तड़पा करती है
कितना अच्छा हो गर मैँ आजाद हो जाऊँ।

अदृश्य बेड़िया है मेरे पैरों में
जब भी मुक्त होना चाहा उभर आती है
जीवन के जंजालों के रुप में
थम सा जाता बस वही पर सब।

मन की आशायें तुझको छूने को
हरदम ललयित रहती है बहुत
मेरा बस नही है ऐ पुरवाई!
वर्ना तेरी गोद में मैं सदियों तलक है सो जाऊँ।

#सरितासृजना

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