इतनी मशरूफ हूँ की आजकल यारों

“वक्त” को भी “वक्त” नही दे पाती हूँ

कोई जानना चाहता है मुझको मगर

“मैं”हूँ कि खुद में ही सिमटती चली जाती हूँ।

बडी मुश्किल सी लगने लगी है राह जिदगीं की

उलझने एक रहस्य सी उलझने लगी है आजकल

जिनमें, “मैं” उलझती चली जाती हूँ।

काली स्याह रात खत्म ही नही होती अक्सर

एक सवेरे की चाह लिए आँखों में

मैं बस आसमाँ को तकती चली जाती हूँ।

कुछ अनोखा होगा इसका मुझको ना भरोसा कोई

बुझे आग के ढेर में एक छुपी चिंगारी सी

बस मैं तो सुलगती सी चली जाती हूँ

#सरितासृजना

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