कुछ नही बदला था पहली मुलाकात

से लेकर आखरी मुलाकात तक।

“शीशा” था दिल तुम्हारा बस यूँँ ही जो टूट गया
आँँखोंं मेंं ख्वाब बनकर बस यूँँ ही जो बस गया।

बन गया था सबक जिंंदगी का स्याह रात की तरह

उलझ गया था किसी अनकही बात की तरह।

तस्वीर कहाँँ रहती सबकी सदा एक सी साल-दर-साल

बदलती रहती तकदीर की तरह वो भी साल-दर-साल।

अंंजुमन मेंं लगी थी बंंदिशे परवाने के लिए कई

शम्मा के आने पर कहाँँ पहरे हजार लगाता कोई।

सफर मेंं हमसफर हमको हमदर्द  ही समझ लेते

तेरे एहसासोंं को थोडा सा तो हम समझ ही लेते।

क्या ले जाते घर से जाते वक्त तुम मेरे सिवा

क्या था पास तुम्हारे मेरी यादोंं और आहोंं के सिवा।

आँँसुओंं ने कब दिल के दागोंं को धोया है “सरिता”

उन्होनेंं तो हमेशा दामन को भिजोया है “सरिता”।

बडे ना शुक्रे हो दोस्त अपना इलजाम शीशे के सिर लगाया है

इसकर, तेरे हिस्से मेंं सिर्फ शीशे का टुकडा-टुकडा ही आया है।

बिखरा है “शीशा” उन्ही राहोंं पर कसम से आज भी

देख लो जाकर नजर आता है चेहरा तुम्हारा “सरिता” उनमेंं कसम से आज भी।

#सरितासृृजना

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