आँँखोंं के किनारोंं की कोर पर ,

आकर ठहर गई जो “एक बूँँद” सी है

बहुत संंभाला मगर साथ छूट ही गया,

यादेंं सिमटकर रह गई एक सूँँद सी है।

हाय, कितना संंवारा वक्त को

फिसल गई निगौडी, रफ्तार इसकी रेत सी है।

खाली है अब हर एक कोना दिल का,

बस कर ,बहुत इम्तिहान ले लिया सबर का।

हार गये अपनो से, क्या शिकवा ,क्या शिकायत अब

ये ऐसी कहानी , जिसका ना था कोई  सबब।

रवानी है जबतलक  लहू की ,इस जिस्म की रगो मेंं

खत्म ना हो ये बात चलती रहे, जबतलक सबोंं मेंं।

चोट है हल्की मगर जख्म है गहरा तेरा

कैसे भूल पाऊँँगी अतीत तो है ,चेहरा तेरा।

खुश नही हूँँ ,कि गम से रहा है वास्ता मेरा

जा निकल जा ऐ खुशी बगल से,मेरा घर नही है रास्ता तेरा।

मन भटकता है अनजान गुनाहोंं के जंंगल मेँँ

जीत नही पाई खुद को, आज तक रिश्तोंं के दंंगल मेँँ

जो पा रही हूँँ वो ही  तो लौटा रही हूँँ मैंं

तय ही नही कर पाई किस सफर पर जा रही हूँँ मैंं।

सच है एक उबलते हुए लावे का संंमदर

जज्ब हो चुका हर किस्सा ,अब मेरे मन के अंंदर।

#सरितासृृजना

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