लबोंं पर खामोशी ,आखोंं मे नमी

ऐ खुदा तेरी जमींं पर प्यार की एक “कमी सी है”।

आती नही नजर ऐ”सरिता”,इंंसानियत की तस्वीर

पता नही मगर क्यूँँ ,बहुत धुंंधली सी है।

घबरा जाती हूँँ उजालोंं मेंं भी ,काले सायोंं से

नंंगेपन का इल्जाम सहती, पर जब ढकी गई तब भी नजर कब थमी सी है।

जब भी रखती हूँँ कदम अपने जगह,जगह ,

वो फर्श ,वो जमींं,मेरी आबरु के खूंं से सनी सी है

एक सवाल औ हजारोंं जवाब मिलते यहाँँ

क्रंंक्रीटो के जंंगल औ इंंसानोंं के बाजार मेंं

मेरी मासूमियत ठगी गई एक मूरत सी है।

#सरितासृृजना

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