क्योंं बांंधते हो पैरोंं को मेरे बेडियोंं से,

आजादी दे दो उनको जरा सी,

फिर मेरे कदमोंं की रफ्तार तो देखो।

क्योंं बंंदिशे लगाते हो मेरी मुस्कुराहट पर,

मुक्त कर दो पाबंंदियोंं से जरा सा,

फिर मेरी हँँसी मुस्कान तो देखो।

क्योंं लाद देते हो मुझपर जिम्मेदारी का बोझ,

उस भार से मुझको राहत तो दे दो जरा सी,

फिर मेरे विचारोंं की उडान तो देखो।

क्योंं नही विश्वास है आज क्षमताओंं पर मेरी,

हटा लो सारे नियमोंं को जरा सा,

फिर मेरा नाम ना हो दुनिया मेंं तो देखो।

क्योंं तोडते हो सपनोंं को मेरे,

उनको भी तो साकार करने दे दो जरा सा,

फिर मेरी कामयाबी की जो न बन जाये मिसाल तो देखो।

#सरितासृृजना

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