अक्सर जब भी अकेली होती हूँँ मैंं

यादोंं की सहेली होती हूँँ मैंं

कुछ अच्छा ,कुछ बुरा ,सारा कुछ 

आ जाता सामने ,सब कुछ।

भूली-बिसरी सी होती हूँँ मैंं

कभी बिखरती,कभी सिमटती हूँँ मैंं अक्सर जब भी ……..

एक प्रवाह मेंं बहता जाता था मन

बंंध सा तब यह,जाता था तन।

सारी अच्छी बातोंं को समेटा यादोंं मेंं

पर एक दो कडवी बातोंं को छुपाया दामन मेंं

कुछ-कुछ उलझी,कुछ-कुछ सुलझी

एक अबूझ पहेली सी होती हूँँ मैंं अक्सर जब भी…….

खुद मेंं खुद को ढुँँढती रहती,

तूफानोंं से जूझती रहती,

जीवन लगता भूलभूलैंंयोंं का मेला

संंग नही यहाँँ सब कोई अकेला

बिन पतवार की नईया जाने कहाँँ लगे किनारा,अक्सर मैंं जब भी …….

#सरितासृृजना

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