बरबस ही उसका चेहरा आँँखोंं के सामने आ गया।नाम कुछ अच्छी तरह से याद नही शायद “शांंताबाई कांंबळे”? हाँँ यही था।

लेकिन हम उसे आजी कहा करते थे।हमारे पडोस मेंं यह महाराष्ट्रियन परिवार रहा करता था ।उनके परिवार मेंं आजी सबसे बूढी थी ।बेटा मधुकर ,बहू का नाम याद नही आ रहा क्योंंकी हम उन्हेंं “भाभी” कहा करते थे। तीन बेटियाँँ पदमा,नंंदा और रेखा।पदमा सबसे बडी थी ,शांंत और स्थिर स्वभाव। नंंदा थोडी सी चंंचल और रेखा कुछ ज्यादा ही चंंचला।

मगर नियती बडी ही कठोर थी रेखा को पोलियो था ।चल नही पाती थी पर ना चल पाने की बेबसी उसके चेहरे पर नजर नही आई कभी। हमेशा चहकती रहती ।बेजान पैरोंं को घसीट-घसीटकर यहाँँ-वहाँँ घूमती रहती थी।उनके पास इतने पैसे नही थे की वो उसके लिए व्हिलचेयर खरीद सके मधुकर किसी मिल मेंं वर्कर थे ।पूरे परिवार का बोझ उनके ही सिर था।

पदमा मेरी हमउम्र थी सो हमारी बनती थी।पिता को पंंसद नही था मैंं उनसे ज्यादा घुलुमिलूँँ वजह गरीबी नही थी वजह थी “जात”। पिता बडे ही कट्टर ब्राहमण थे।दिल से उदार थे पर कभी-कभी कट्टरता हावी हो जाती थी उनपर।

मुझे पढना पंंसद था वही पदमा को भी पढने मेंं रुचि थी ।जब पिताजी घर पर नही होते वो मेरे घर आजाती या मैंं वहाँँ चली जाती।हम जब भी खेला करते थे तो आजी हमेशा हमारी मस्तियोंं मेंं शामिल हो जाया करती थी। आजी का कलर गहरा था ।आँँखोंं से भी साफ दिखाई नही देता था।पर फिल्मोंं की बडी ही शौकीन थी आजी।

फिल्मोंं की वजह से आस पडोस के कुछ मनचले लोग उन्हेंं “हेमामालिनी” कहकर भी चिढाया करते थे।वो दिखावटी गुस्से से चिल्लाया करती “तुझ्या घरातंं आई बहिणंं नाही आहे का ,माझी टिंंगल काढतोस मेल्यांं”।”ये इकडे दावते तुला”।और लोग चिढाकर भाग जाते।

आजी हमेशा मेरा नाम गलत लिया करती थी “काय गंं सनिता काय चाललयंं ,आज कोणता नवीन पिक्चर येतोयंं टीवीवर”? मैंं कहती।” आजी मेरा नाम मत बिगाडो” वही पदमा बोल पडती “अग आजे ती सनिता नव्हे ,ती सरिता आहे”।आजी बोलती “त्यातंं काय झालंं ,अरे मुलिनोंं काय नाम बदल्याने माणूस बदलतो काय? मी तिला प्रेमानी हाक मारत असते”।

आजी की आँँखोंं मेंं मैने हमेशा एक खामोश र्दद छुपा हुआ महसूस किया था।मगर वो हँँसकर जिंंदगी जिये जा रही थी एक दिन उनपर पहाड टूट पडा मधुकर का एक्सीडेंंट हो गया और वो चल बसे। परिवार मेंं मातम ऐसा छाया जैसे ये दुख के बादल कभी नही छटेगेंं। मैंं काफी दिनोंं तक वहाँँ जा नही पाई पदमा से भी मिल नही पाई ।मनाही थी क्या करती मैंं बहुत छोटी थी तब विरोध नही कर पाई।और डर भी गई थी पहली बार लाश देखी थी । वो भी मधुकर की।

समय बीतता रहा उस परिवार ने जीना सीख लिया अपने आधार स्तंंभ के बिना ।पेट के लिए भाभी ने कही नौकरी पकड ली ज्यादा पढी लिखी नही थी इसलिए कामचलाऊ काम मिल गया था।जीवन दुबारा पटरी पर दौडने लगा था।

कहानी आज अधूरी पूरी फिर कभी ……..

पहली बार कहानी लिखी है दोस्तोंं अपनी राय जरुर देंं।

#सरितासृृजना

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