(1)

जाना था संंमदर पार हमेंं कश्ती नही मिली ।।

हो जाती हम पर कुर्बांं हमेंं ऐसी हस्ती नही मिली।।

                               (2)

राहेंं बहुत मिली मगर चलने की हमको चाह ना हुई।।  

जिन्हेंं चाह हुई ,उन्होंंने संंमदर पर रास्ते बना लिए।।

#सरितासृृजना

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