मन जो बादल हो जाता मैंं बूँँदो सी बरस जाती

मन जो गुलशन हो जाता मैंं चंंपा सी महक जाती

मन जो उपवन हो जाता मैंं हिरनी बन खो जाती

मन जो गागर हो जाता मैंं जल बन समा जाती

मन जो अक्षर बन जाता मैंं रचना सी रच जाती

मन जो स्याही हो जाता मैंं कागज पर छा जाती

मन जो आँँचल बन जाता मैंं पुरवा सी उड जाती

मन जो घुँँघरु बन जाता मैंं पैरोंं मेंं बंंध जाती

मन जो काजल बन जाता मैंं आँँखोंं मेंं बस जाती

मन जो मेंंहदी हो जाता मैंं हाथोंं मेंं रंंग जाती

मन जो बिंंदिया बन जाता मैंं माथे पर सज जाती

मन जो सागर बन जाता मैंं “सरिता” सी समा जाती

मन जो चंंदन बन जाता मैंं सर्पो सी लिपट जाती

मन जो दीया हो जाता मैंं बाती सी जल जाती

मन जो नीलगगन बन जाता मैंं इंंद्रधनुष सी छा जाती

मन जो दर्पण हो जाता मैंं रुपसी बनकर सँँवर जाती 

मन जो पापी बन जाता मैंं गंंगाजल सी बन जाती

#सरितासृृजना

Advertisements