चेहरा बयांं करता था र्दद और मजबूरी की दास्ताँँ

उसके बोल

“जिम्मेदारी की चादर लपेटकर बैठी हुँँ मैंं

खुशियाँँ खरीदने जिस्म के बाजार मेंं”

क्याऔरत एक सामान नही है ?

अगर नही है तो क्योंं वो बिकती है बाजारोंं मे ?

हर सामान की तरह उसकी भी बोली लगती है बाजारोंं मेंं

जब तक भायीइस्तेमाल हुई  फिर फेंंक दी जाती है कबाडो मेंं

गुम हो जाती है उसकी सिसकीयाँँ ना जाने किन अंंधियारी गलियोंं मेंं

 हाँँ वो “तवायफ” है जो समाज का सबसे गंंदा हिस्सा मानी जाती है।

क्या जवाब देगा कोई ?

उसको उस गंंदी गलियोंं मेंं किस समाज के मर्द की “इंंसानियत” पहुँँचाती है ।

क्या “वेश्या” होने का तमगा वो लेकर पैदा होती है ?

क्युँँ वो सबसे अलग होकर मजबूर जिंंदगी जीती है?

#सरितासृृजना

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