तलाश है मुझको अपनी पहचान की

ढुँँढने निकली हुँँ पथरीली, काँँटेदार राहोंं पर।

तलाश है मुझको अपने अस्तित्व की

समाज मेंं कहाँँ है मेरा स्थान, इस बात की।

तलाश है मुझको मेरे उन सपनोंं की

जिन्हेंं देखते हुए मैंं बचपन को लाँँघ चुकी हुँँ।

तलाश है मुझको उन हौसलोंं की 

जो कदम-कदम पर मेरा उत्साह बढाये।

तलाश है मुझको उस विश्वास की

जिस पर आँँखे बंंद कर मैंं आगे बढ सँँकू।

तलाश है मुझको उन भावनाओंं की

जो मेरे पवित्र मन को चोट ना पहुँँचाये।

तलाश है मुझको ऐसे आसमान की

जहाँँ मैंं अपने पंंखोंं को फैलाकर उड सँँकू

स्वछंंद रुप से।

#सरितासृृजना

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