कल रात मैंं सो नही पाई ना तनहाई, ना रुसवाई

पता नही कौन सा एहसास

जिसको मैंं कोई नाम नही दे पाई।

सब है, मगर कुछ-कुछ खाली-खाली सा है

भरापूरा सा दिखता है मगर कुछ-कुछ अधूरा

जिसको मैंं कोई नाम नही दे पाई।
साथ हमसफर है ,साथ हर खुशी है

पर ना जाने मन को क्या आस निगाहेंं ढुँँढती उस डगर पर कुछ

जिसको मैंं कोई नाम नही दे पाई।

वो जो है ,मेरा अपना तो नही

फिर भी चाहत को वो बढाता जाता है रिश्ता कुछ ऐसा पनपा दिल मेंं मेरे

जिसको मैंं कोई नाम नही दे पाई।

दिन-रात क्युँँ है बैचेनी सी छाई,

मेरे दिलोंंदिमाग पर इस कदर

जिसको मैंं कोई नाम नही दे पाई।

पता नही क्या हो अंंजाम ,इन नादानियोंं का

शुरु तो हो चुकी है बेवकूफियाँँ”सरिता”

जिसको मैंं कोई नाम नही दे पाई।

#सरितासृृजना

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