ज़िदगीं कैसे -कैसे लोंगो से मिलाती है तू कोई अच्छा , कोई बुरा ,कोई कुछ भी नही,

हर इंसान की बदलती तस्वीर से रूबरु कराती है तू।

अच्छी सूरत के पीछे बदनीयती छिपाये फिरते है पल-पल में रंग बदलते रहते है,

हर एक इंसानी रंग से वाकिफ़ कराती है तू।

कभी ज़ख्म देते है ,कभी इलज़ाम देते है ,दर्द के तोहफे साथ लिए फिरते है ,

ऐसे,

बेदर्द ज़ालिमों से क्युँ हमेशा मिलाती है तू।

लाखों की भीड़ में ये पहचाने नही जाते ख़ामोश ,तुफाँ से गुजर जाते है,

क्युँ,

ऐसे नाशुक्रे दोंस्तो को गले से लगाती है तू।
क़शमक़श को हमेशा बनाये रखते है, दिल को उलझनों में फँसाये रखते है।

ऐसे,

क़ाफ़िरों क्यों पास और पास लाती जाती है तू,

भीड़ में वही अपने से लगने लगते है जो आँखों में दग़ा लिए फिरते है।

क्युँ,

उनको नही ,रोज़ आज़माती है तू।

जिंदगी कैसे-कैसे लोंगो से………                       #सरिता सृजना​

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